Monday, October 20, 2014

प्यास

जीवन प्यास है
मीरा की आस है
प्रेम अगन  है
राधा मगन है

ठहरा है समय
होकर मैं तन्मय
करूँ जतन पे जतन
निर्भय हो सुने मन

समर्पण या प्रेम हो
भूख या सूखी डाल हो
बहना ज़िन्दगी हो
सहना मीठी बंदगी हो

सूखे मौसम में बरसात
हो जैसे बहते झरने की बात
बहारों में तारों की रात
क्यों रह जाती है यह सौगात

एक मीठी सी आस
यह गीली सी प्यास
होठों पे यह रास
अधूरा सा एहसास

Saturday, January 18, 2014

नेपथ्य में



नींव की ईंट बनूंगी 
लहर बनके बहूँगी 

आसमान का तारा बनें 
पेड़ की निर्बोध जड़ रहें 

देश के सिपाही रहना 
'आम औरत' गमछा पहना 

समुद्र का धरातल जैसा 
शेर की कन्दरा वैसा 

वाक्य का आखिरी अक्षर 
जैसे गाँव का सूखा पोखर 

शरीर का एक अंश बनूँ 
तेरे आंसुओं की बूँद रहूँ 

यही एक स्वप्न है मेरा 
यथार्थ का स्वार्थ है तेरा 

आकाशवाणी जैसा स्वर 
बढ़ता हुआ समाज का ज्वर 

कैसी 'लीला' है राम अपार ?
हनुमान - बनाओ हमें साकार 

हम भी देखें वास्तव में 
जैसे हम नेपथ्य में 

Wednesday, April 24, 2013

विद्दा

पुस्तकस्था तुया  विद्दा
परहस्त गतम धनं

कार्यकाले समुत्पन्ने
नसा विद्दा न तद्धनम 

Wednesday, April 10, 2013

मातृत्व - सुख की खोज

रुदन करते रुद्राक्ष
महिमा - मंडित होती ममता
ओजस्वी ॐ की ओस
गोद में दो बूँद ठोस ..
क्या यही मातृत्व है?

ममत्व भरी मोहिनी की मुस्कान
कोलाहल करते कुश-लव के गान
अठखेलियाँ अनेक आँगन में
बचपन के बोल बाल - कृष्ण में
क्या यही है मातृत्व ?

एक एकाकी स्पर्श सुनहरा
कोमलता का कलरव गहरा
बंधे एक सूत्र में दो पल
तुम्हारा मुख मेरा वक्ष - स्थल
क्या यही मातृत्व है ?

प्रकृति के 'तीन ऋणों  ' की आपूर्ति !

Sunday, April 7, 2013

एक लघु भारत


भूखा पेट करता व्यवसाय
देह पर सहता अन्याय

माझी की मझधार में
हमारी एक कटार में

वास करते हैं आप
और करते रहते हैं पाप

चक्रव्यूह है अभिमन्यु का
राजनीति और सामाजिक परिस्थिति का

'फूलन ' और 'भंवरी ' सखियाँ
अश्रु-धारा में बह गयी अँखियाँ

बाल्य - काल था सुखमयी
यौवन भी रहा रहस्यमयी

अब वयस्क हैं पर क्या
'यूथ पॉलिटिक्स' नज़र आती 'इश्किया'

देह पर हक मांगने हेतु
बनाएंगे हम कोई भी 'सेतु'

'जय हिन्द'!

Saturday, April 6, 2013

ठिठके कदम

ठिठके कदम 
हताहत हुए 
दिवंगत कदम 
ठोकर खाते हुए 
सीमाओं को लांघते 
ठिठके कदम .......

स्वयं की प्रीत
कम्पन करती 'लोक ' नीति 
'लोक' 'तंत्र' से भयभीत 
ग्रंथों के विपरीत 
बाहुबलियों की रण नीति 
ठिठके कदम ...... 
 

Saturday, March 17, 2012

कितना 'समाजवाद' है सपा में?

समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सरकार ज़रूर बना  ली है लेकिन पार्टी में गुंडई बने रहने की छवि अभी भी बनी हुई है . हाल ही में शपथ लेने वालों में से  २८ मंत्री ऐसे हैं जिनके खिलाफ कोर्ट कचेहेरी के केस चल रहे हैं. अखिलेश यादव, जो की युवा पार्टी के युवा चेहरे हैं, उन्होने भी पार्टी में इस तरह के लोगों को लाकर जनता के बीच कोई ख़ास अच्छा सन्देश नहीं भेजा है जिससे लोगों तक यह बात पहुँच सके कि वो  पार्टी की 'गुंडई' छवि को या 'दबंग' छवि को बदलने का कोई प्रयास कर रहे हैं.

सब जानते हैं कि विश्वविद्यालयों में एवं छात्र संघ राजनीति में इस पार्टी का बहुत बड़ा योग दान है. सिर्फ मायावती ने ही छात्र संघ राजनीति में पाबंदी लगायी हुई थी जिससे प्रदेश के असामाजिक तत्त्व और अराजकता फैलाने वाले तत्त्व किस कोल में छुपे बैठे थे पता ही नहीं चला था इतने साल. लेकिन युवा वर्ग के बीच लोकप्रिय बनने का इक मुख्य कारण यह भी है कि सपा युवाओं के बीच पनाह देती है नक़ल, झूठ, फरेब, चोरी, जालसाजी, बिना लाइसेंस गाडी चलाना जैसी चीज़ों को. युवाओं के बीच जो मुख्य मुद्दा है- रोज़गार पाना या शिक्षा के नए आयाम खोजना और शिक्षा और रोज़गार पर सोचना ताकि भविष्य उज्जवल बनाया जा सके- इन मुद्दों पर आजकल का युवा कितना सोचता है ? कम से कम जो सोचता भी है, तो वोह युवा वर्ग वोट डालने नहीं जाता - अफ़सोस!!

इस चुनाव से यह बात साफ़ ज़ाहिर है कि शहरों में भी जो वर्ग सामने वोट डालने आया है, यह सुशिक्षित सुशील वोटर वर्ग नहीं है. यह वोह वर्ग है जो मायावती की  भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार से निजात तो चाहता था लेकिन उसका जवाब उसे समाजवाद-लोहियावाद की इस मिलीजुली सपा में मिलेगा, ऐसा पूरी तरह अनुमान नहीं था . अखिलेश की क्रांति रथ यात्रा ने तोह अपना रंग दिखा दिया लेकिन उनकी मंत्रियों की टोली अब कितना कमाल दिखा पाएगी, यह देखना बाकी है .

क्या वाकई में सपा में तनिक भी 'समाजवाद' है? गाँव में, शहरों के गरीब इलाकों में और प्रदेश के मुसलमान वोटरों में लोकप्रियता ज़रूर बढ़ी है लेकिन क्या पार्टी इस बार अपनी लोकप्रियता बनाए रह पाएगी ? कहीं यह सिर्फ एंटी - incumbency का खेल तो नहीं ?