Friday, December 12, 2014

Romancing Facebook

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Sunday, November 30, 2014

अर्धांगिनी



अर्धांगिनी बनी हूँ जीवन की
संगिनी एक पल किस्मत ही की
पंथी मिले बहुतेरे रास्ते में
जीवन जैसा न कोय

अर्धांगिनी बनी हूँ जीवन की

जब रुलाये जब हंसाए
जब दौड़वाये जब सुलवाये
सब कर्त्तव्य संग-संग निभाये
राही नहीं है याद कोय

अर्धांगिनी बनी हूँ जीवन की

पंथ कौन या रीत है कौन
जो मिले अपनाये सबको
समय बीते न पता चले
किससे लागे जिया मोये

अर्धांगिनी बनी हूँ जीवन की

समर्पण है पूरा जिससे वो
जीवन साथ देता है अथाह
सब निकट हैं दूर भी सब
एक जीवन नहीं खोता मोये

अर्धांगिनी बनी हूँ जीवन की

Tuesday, November 18, 2014

रकीब की क़ुर्बानी

बावरा दिल फिर खोजन निकला
ऐ इश्क़-ए-मशाल  पर पिघला

याद आती थी उनकी बहुत
इतनी कि पार कर गए सरहद

सोचा न देखा न सुना कुछ
आँखें खोल के पिया सचमुच

निगाहों का इशारा न समझा
न जाना वैरी न मित्र या साझा

जुस्तुजू जुस्तुजू रही दीवानगी
न इल्म रहा कब कर बैठे हम बंदगी

वोह आयतें वोह सूरा और कलाम
सभी हैं लगते दोस्त-ए - कलम

यार का याराना और बेरुखी भी देखी
ज़ाहिर और छुप छुप के सभी लिखी

एक और एक ग्यारह होते या दो
अब लेना नहीं यारों बस मकसद है दो

अल्लाह -ए - जतन किये  जाते हैं
तुम पे ये क़ुर्बानी दिए जाते हैं





Saturday, November 8, 2014

सिफर

बेशुमार हमसफ़र हैं
फिर भी इक सिफर है

हज़ारों चलते हैं साथ
फिर भी दूर हैं सबके हाथ
एक-एक  तारा कहता यह  कहानी
नयी सुनाओ नहीं सुननी पुरानी
अकेली वह डगर है अनोखी
न हैं दोस्त न ही कोई सखी
फिर भी रास्ता पकड़ना है यारों
शत्रु बनें या रहते तुम प्यारों

बेशुमार हमसफ़र हैं
फिर भी इक सिफर है

हर राह को पकड़कर एक
मिलती है मंज़िल वहीँ अनेक
छोड़ देते हैं सभी राहों में
हासिल होता है गंतव्य निगाहों में
लेकर एक सपना नया
छोड़कर निष्ठुर प्रेम और दया
चलें एक अनूठी मंज़िल
बनते हुए अधूरी ग़ज़ल


बेशुमार हमसफ़र हैं
फिर भी इक सिफर है 

Monday, October 20, 2014

प्यास

जीवन प्यास है
मीरा की आस है
प्रेम अगन  है
राधा मगन है

ठहरा है समय
होकर मैं तन्मय
करूँ जतन पे जतन
निर्भय हो सुने मन

समर्पण या प्रेम हो
भूख या सूखी डाल हो
बहना ज़िन्दगी हो
सहना मीठी बंदगी हो

सूखे मौसम में बरसात
हो जैसे बहते झरने की बात
बहारों में तारों की रात
क्यों रह जाती है यह सौगात

एक मीठी सी आस
यह गीली सी प्यास
होठों पे यह रास
अधूरा सा एहसास

Saturday, January 18, 2014

नेपथ्य में



नींव की ईंट बनूंगी 
लहर बनके बहूँगी 

आसमान का तारा बनें 
पेड़ की निर्बोध जड़ रहें 

देश के सिपाही रहना 
'आम औरत' गमछा पहना 

समुद्र का धरातल जैसा 
शेर की कन्दरा वैसा 

वाक्य का आखिरी अक्षर 
जैसे गाँव का सूखा पोखर 

शरीर का एक अंश बनूँ 
तेरे आंसुओं की बूँद रहूँ 

यही एक स्वप्न है मेरा 
यथार्थ का स्वार्थ है तेरा 

आकाशवाणी जैसा स्वर 
बढ़ता हुआ समाज का ज्वर 

कैसी 'लीला' है राम अपार ?
हनुमान - बनाओ हमें साकार 

हम भी देखें वास्तव में 
जैसे हम नेपथ्य में 

Wednesday, April 24, 2013

विद्दा

पुस्तकस्था तुया  विद्दा
परहस्त गतम धनं

कार्यकाले समुत्पन्ने
नसा विद्दा न तद्धनम